मैं स्वयं को इस संगठन का केवल संस्थापक नहीं मानता।
मैं स्वयं को सनातनी तांडव सेना का प्रथम कार्यकर्ता मानता हूँ।
सनातनी तांडव सेना का जन्म किसी साधारण विचार से नहीं हुआ।
यह एक आंतरिक जागृति, दिव्य संकल्प, सनातनी चेतना और समाज उत्थान के जीवित भाव से उत्पन्न हुआ है।
मेरा स्पष्ट ध्येय है
हिंदू समाज में एकता, जागृति, चरित्र, संस्कार, शक्ति, स्वावलंबन और संगठित जीवन को सक्रिय करना।
हम परिवारों को मजबूत करते हैं।
हम बच्चों में तेज जगाते हैं।
हम युवाओं में लक्ष्य और पुरुषार्थ भरते हैं।
हम समाज में समन्वय और सहयोग को बढ़ाते हैं।
हमारे यहाँ पद से अधिक जिम्मेदारी का महत्व है।
हमारे यहाँ सम्मान से अधिक सेवा का महत्व है।
हमारे यहाँ नाम से अधिक कार्य का महत्व है।
मैं मानता हूँ कि
जब कार्यकर्ता जागता है,
तब परिवार जागता है।
जब परिवार जागता है,
तब समाज उठता है।
जब समाज उठता है,
तब युग परिवर्तन प्रारम्भ होता है।

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